गिलहरी ने अपनी पूंछ को फहराते हुए एक और अखरोट जमीन में छिपाया। उसके चतुर और सतर्क स्वभाव ने उसे हमेशा जंगल में सुरक्षित रखा था। तभी, पेड़ की एक ऊँची शाखा पर कौआ आकर बैठ गया।
"हाय गिलहरी जी, आप बहुत मेहनती हैं। आप इतने सारे अखरोट कैसे ढूंढती हैं?"
"मैं हर जगह देखती हूँ। कभी-कभी तो मुझे जमीन खोदनी पड़ती है," गिलहरी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह जानती थी कि कौआ के मन में कुछ और ही है।
"वाह! आप बहुत होशियार हैं। मैं भी आपके साथ अखरोट ढूंढना चाहता हूँ," कौआ ने कहा, उसके शब्दों में छलावा था।
"ठीक है, लेकिन आपको मेरी मदद करनी होगी। आपको इन सभी अखरोटों की रक्षा करनी होगी जब मैं उन्हें छिपाऊँगी," गिलहरी ने कहा, उसकी चालाकी से मुस्कुराते हुए।
कौआ ने खुशी-खुशी सहमति जताई और पेड़ के नीचे निगरानी करने के लिए खड़ा हो गया।
कौआ ने सोचा, "अब मैं अकेला ही सारे अखरोट खा जाऊंगा।" जैसे ही उसने पहला अखरोट उठाया, बंदर ने उसे डराकर सभी अखरोट खा लिए।
"अखरोट कहाँ हैं?" गिलहरी ने पूछा, उसकी आवाज में हल्की सी हंसी थी।
"वह... वह... बंदर उन्हें ले गया," कौआ ने डरते हुए कहा।
"तुमने मेरी रक्षा करने की कसम खाई थी, फिर तुमने उन्हें कैसे जाने दिया?" गिलहरी ने कहा, उसकी मुस्कान में एक सीख थी।
कौआ शर्मिंदा हो गया। गिलहरी ने उसे बताया कि हमेशा सावधान रहना जरूरी है। उस दिन के बाद, गिलहरी ने अपने राज़ किसी से नहीं बांटे।















