गांव में पूर्णिमा की रातों का जिक्र होते ही एक सन्नाटा पसर जाता था। चांदनी की रोशनी में गांव का हर कोना चमकता था, लेकिन उस चमक में एक खौफनाक रहस्य छिपा रहता था। रमन, एक उत्सुक युवक, इन रहस्यों को जानने की चाह में गांव के बुजुर्गों से सुनाए गए किस्से सुनता रहता था। "क्या सच में कोई आत्मा है जो हर पूर्णिमा को किसी की जान लेती है?" वह सोचता और इस रहस्य का पर्दाफाश करने की ठान लेता।
रमन ने एक रात जंगल में स्थित पुराने मंदिर जाने का निर्णय लिया। वह जानता था कि इस यात्रा में खतरे थे, लेकिन उसकी जिज्ञासा उसे रोक नहीं सकी। मंदिर के रास्ते पर चलते हुए, उसे पेड़ों के बीच से आती एक अजीब सी गंध महसूस हुई। "यहां कुछ न कुछ जरूर है," उसने खुद से कहा, और अपने कदमों को मंदिर की ओर बढ़ा दिया।
मंदिर के अंदर का दृश्य खौफनाक था। दीवारों पर खून के धब्बे और वेदी पर जलती मोमबत्तियाँ थीं। रमन का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। तभी एक भयावह आवाज ने उसकी तंद्रा तोड़ी, "तुमने मुझसे मिलने का निर्णय लिया है, अब तुम मेरे शिकार हो।" उसने घबराकर देखा और उसके सामने एक खून से सनी हुई महिला की आकृति प्रकट हो गई।
आत्मा की आँखें लाल थीं और वह खून की प्यास से तड़प रही थी। "तुम मेरे खून को नहीं समझ सकते," उसने कहा। रमन ने साहस दिखाते हुए कहा, "तुम्हारी प्यास को शांत करने का कोई और तरीका नहीं है?" आत्मा ने हँसते हुए कहा, "तुमसे कोई मदद नहीं हो सकती। अब तुम्हारी बारी है।"
रमन ने अपनी जान बचाने के लिए भागना शुरू किया, लेकिन मंदिर से बाहर निकलते ही उसने देखा कि पूरा जंगल उसकी ओर बढ़ रहा था। "तुम्हें शांति क्यों नहीं मिल रही?" उसने चीखकर पूछा। आत्मा ने कहा, "शांति! मुझे मेरी प्यास चाहिए।" और उसे अपने खून के प्याले जैसा शरीर में खींच लिया।
अगली सुबह गांववालों ने रमन का खून से सना हुआ शरीर मंदिर के पास पाया। अब उसकी आँखों में भी वही खौ़फनाक प्यास थी। गांववालों ने इस घटना को चेतावनी के रूप में लिया और पूर्णिमा की रातों में बाहर निकलना बंद कर दिया। रमन अब उसी आत्मा का हिस्सा बन चुका था और हर पूर्णिमा को वह भी किसी न किसी का शिकार बनाने के लिए बाहर निकलता था।
















