कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था, जहाँ उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव को कैद किया गया था। उस रात, जब आकाश में बिजली चमकी और यमुना की लहरें शांत हो गईं, वसुदेव ने शिशु कृष्ण को टोकरी में उठाया और यमुना नदी को पार कर वृंदावन पहुँचे। वहाँ उन्होंने बालक को नंद और यशोदा के घर छोड़ दिया। "यहाँ तुम सुरक्षित रहोगे, मेरे पुत्र,"
कृष्ण अपने दोस्तों के साथ वृंदावन की हरी-भरी घास पर खेल रहे थे। अचानक, कंस के भेजे हुए राक्षस ने उन पर आक्रमण किया। कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग कर राक्षस को हराया। "डरो मत, मेरे साथ हो तुम सुरक्षित हो," उन्होंने अपने मित्रों को आश्वासन दिया।
कृष्ण गोपियों के साथ यमुना के किनारे रास रचा रहे थे। उनके बांसुरी की धुन पर सब मंत्रमुग्ध हो गए। राधा, जो गोपियों में सबसे प्रिय थी, ने कृष्ण से कहा, "तुम्हारी बांसुरी की धुन हमें स्वर्ग का अनुभव कराती है,"
कृष्ण और उनके मित्र गायों के झुंड के बीच खेल रहे थे। वे कभी पेड़ों पर चढ़ जाते, तो कभी नदी में तैरते। उनके खेलों में भी एक विशेष बात होती। बलराम, उनके बड़े भाई ने कहा, "कृष्ण, तुम हमेशा कुछ नया करते हो,"
यमुना नदी का पानी दूषित हो गया था। कृष्ण ने उसमें से विष पीकर यमुना को शुद्ध किया। यशोदा, उनकी माता, चिंतित होकर बोलीं, "मेरे लाल, तुमने हमें बचा लिया,"
वर्षों बाद, कृष्ण ने मथुरा जाकर कंस का वध किया। यह एक निर्णायक क्षण था। "अब प्रजा स्वतंत्र है," कृष्ण ने गर्व से कहा, और अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया।
















